सेवादान से आनंद
नमस्कार मित्रो मेरा नाम हैं, शशांक भारद्वाज और आपका हमारे ब्लॉग Hindi Gyan Blogger में स्वागत है। आज हम आपको महत्वपूर्ण लेख के बारे में बताएंगे, जिसको पढ़कर आपको ज्ञान की प्राप्ति होगी ।।
क्या आपको भी सेवादान से आनंद आता हैं तो ये कहानी आप के लिए है
जापान में एक झेन फकीर को कुछ मित्रों ने भोजन पर बुलाया था। सातवीं मंजिल के मकान पर भोजन कर रहे हैं, अचानक भूकंप आ गया। सारा मकान कांपने लगा। भागे लोग। कोई पच्चीस-तीस मित्र थे।
सीढ़ियों पर भीड़ हो गयी।
जो मेजबान था वह भी भागा। लेकिन भीड़ के कारण अटक गया दरवाजे पर। तभी उसे ख्याल आया कि मेहमान का क्या हुआ?
लौटकर देखा, वह झेन फकीर आंख बंद किये अपनी जगह पर बैठा है
जैसे कुछ हो ही नहीं रहा! मकान कंप रहा है, अब गिरा तब गिरा। लेकिन उस फकीर का उस शांत मुद्रा में बैठा होना, कुछ ऐसा उसके मन को आकर्षित किया, कि उसने कहा,अब जो कुछ उस फकीर का होगा वही मेरा होगा। रुक गया। कंपता था, घबड़ाता था, लेकिन रुक गया।
भूकंप आया, गया। कोई भूकंप सदा तो रहते नहीं। फकीर ने आंख खोली, जहां से बात टूट गयी थी भूकंप के आने से, वहीं से बात शुरू की।
लेकिन मेजबान ने कहा : मुझे क्षमा करें, मुझे अब याद ही नहीं कि हम क्या बात करते थे। बीच में इतनी बड़ी घटना घट गयी है कि सब अस्तव्यस्त हो गया।
अब तो मुझे एक नया प्रश्न पूछना है। हम सब भागे, आप क्यों नहीं भागे?
उस फकीर ने कहा : तुम गलत कहते हो। तुम भागे, मैं भी भागा। तुम बाहर की तरफ भागे, मैं भीतर की तरफ भागा। तुम्हारा भागना दिखाई पड़ता है, क्योंकि तुम बाहर की तरफ भागे। मेरा भागना दिखाई नहीं पड़ा तुम्हें लेकिन अगर गौर से तुमने मेरा चेहरा देखा था, तो तुम समझ गये होओगे कि मैं भी भाग गया था।
मैं भी यहां था नहीं, मैं अपने भीतर था। और मैं तुमसे कहता हूं के मैं ही ठीक भागा।, तुम गलत भागे।
यहां भी भूकंप था और जहां तुम भाग रहे थे वहां भी भूकंप था। बाहर भागोगे तो भूकंप ही भूकंप है। मैं ऐसी जगह अपने भीतर भागा। जहां कोई भूकंप कभी नहीं पहुंचता है। मैं वहां निश्चित था। मैं बैठ गया अपने भीतर जाकर।
अब बाहर जो होना हो हो। मैं अपने अमृत-गृह मैं बैठ गया, जहां मृत्यु घटती ही नहीं। मैं उस निष्कंप दशा में पहुंच गया, जहां भूकंपों की कोई बिसात नहीं। अगर तुम्हें बाहर का जोखिम दिखाई पड़ जाये तो तुम्हारे जीवन में अंतर्यात्रा शुरू हो सकती है।
जो व्यक्ति आंख नाक कान इत्यादि इंद्रियों से रूप गंध शब्द आदि विषयों का सुख लेता है , तो इसका अर्थ है कि वह भौतिक सुख भोग रहा है।
जो व्यक्ति सेवा परोपकार दान दया यज्ञ ईश्वरोपासना स्वाध्याय सत्संग वैदिक शास्त्रों का अध्ययन इत्यादि शुभ कर्म करके जीवन जीता है , उसे अंदर से ईश्वर सुख रूपी आनन्द देता है ।
आनंद’ और ‘सुख’ – ये दो शब्द अक्सर एक दूसरे के पर्याय के रूप में इस्तेमाल कर लिए जाते हैं लेकिन दोनों में बहुत बड़ा अंतर है।
मिस्र की एक दंतकथा है कि अगर कोई व्यक्ति स्वर्ग में प्रवेश पाना चाहता है तो स्वर्ग के प्रवेश द्वार पर उसे दो सवालों के जवाब देने होते हैं। अगर आपने इन दोनों सवालों के जवाब ‘हां’ में नहीं दिए तो आपको स्वर्ग में प्रवेश नहीं मिलता। इसमें पहला सवाल है - क्या जीवन में आपने खुशी और आनंद का अनुभव किया है?’ और दूसरा सवाल है- ‘क्या आपने अपने आस पास के लोगों को खुशी बांटी है?’
इन दोनों ही सवालों के लिए आपका जवाब अगर ‘हां’ है तो मैं आपको यह बता दूं कि आप तो पहले से ही स्वर्ग में हैं।
भ्रमण एवं भाषणों से थके हुए स्वामी विवेकानंद अपने निवास स्थान पर लौटे। उन दिनों वे अमेरिका में एक महिला के यहां ठहरे हुए थे। वे अपने हाथों से भोजन बनाते थे। एक दिन वे भोजन करने की तैयारी कर रहे थे कि कुछ बच्चे पास आकर खड़े हो गए।
उनके पास सामान्यतया बच्चों का आना-जाना लगा ही रहता था। बच्चे भूखे थे। स्वामीजी ने अपनी सारी रोटियां एक-एक कर बच्चों में बांट दी। मकान मालकिन वहीं बैठी सब देख रही थी। उसे बड़ा आश्चर्य हुआ।
आखिर उससे रहा नहीं गया और उसने स्वामीजी से पूछ ही लिया-आपने सारी रोटियां उन बच्चों को दे डाली, अब आप क्या खाएंगे?
स्वामीजी के अधरों पर मुस्कान दौड़ गई। उन्होंने प्रसन्न होकर कहा- “मां! रोटी तो पेट की ज्वाला शांत करने वाली वस्तु है। इस पेट में न सही, उस पेट में ही सही। देने का आनंद पाने के आनंद से बड़ा होता है।“
*आइये भीतर की तरह दौड़े, सुख ही नही देने का आनन्द भी उठाये🙏
स्वेच्छा से जी भरके सहयोग करें,
सेवासदन से जुड़े- शिक्षा से वंचित बच्चों को साक्षर करे,उनके तन को कपड़ा दे, पेट को भोजन उपलब्ध कराए तथा उनके मन को भरोसा दे कि आप बढ़ो हम समृद्धशाली सदा आपके साथ हैं।
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